29 January, 2011

एक एहसास छोड़ती जाना

मूड कर तुम देखो या ना देखो
बस एक एहसास छोड़ती जाना ज़रूर
कभी जो लौटोगे इधर तक
कुछ बातें करने को होंगी

अजनबी लगो जब मिलोगे कभी
इतनी खामोशी ना छोड़ जाओ
शाम में थॅकी आखें लगेंगी
तो ये और घायल करेंगी मुझे

अधूरी साँसे जो रह गयी अटकी
उन्हे यूँ रहने दो अभी वहीं
फ़ुर्सत में जब भी बैठेंगे
तो उन्हे साथ जी लेंगे कभी

आखों में सुनेपन से लिपटे आँसू
और दिल में दर्द की कुछ गाँठे
मेरे मौला आज तूने इतना दिया
जो कुछ भी मेरे पास खाली नही

मिलोगे फ़ुर्सत में कभी
तो बातें होंगी बाक़ी सारी
अभी एक एहसास छोड़ती जाना
लौटोगे तो मिलूँगा सोचते तुम्हे यही

15 January, 2011

सच है सपने हक़ीकत नही होते

ये नींद खुली ही मेरी क्यों,
जो मैंने सिर्फ़ करवट उलटी,
सूखे गले से आवाज़ ग़ायब
शायद आज फिर सपना देखा है,

अंतर्मन मेरा सहमा होता है
मेरे सोने पे अकेले होने से,
हर रात डरा मुझसे लिपट कर
पिछली रात की बातें बताता है

उसकी बातें किसी सपने सी बेजान,
मेरी ही अधूरी कहानी के पन्ने लगते है
नीरस हो मुझे बेख़बर ज़ो नींद आती है
सुबह मृत सपने बिस्तर पे बिखरे पता हूँ

औरों के होंगे सपने सतरंगी सुहाने
मेरे तो मृत पड़े भी बेरहम दिखते हैं
तशल्ली इस बात होती है मुझे
सुबह होने पे ये खुद टूटे मिलते हैं
सच है सपने हक़ीकत नही होते

क़दरदान

खरीदारों से भरे इस बाज़ार में
नुमाइश से सारोबोर हर चोवराहा
चंद सिक्कों पे बिकती यहाँ मधुबाला
पर कदरदानो की जब बात चले
तो महफ़िल में हम भी आएँगे
सिक्के ना सही तो ग़म नही
एक मधुबाला हम भी ले जाएँगे

एक पुराना प्रसंग और मेरा अंतरदवन्द

आज फिर से भभूत कुरेदे जाएँगे,
पुराने प्रसंग पर लोग मारे जाएँगे,
क्या ग़लत और सही, मैं नही जानता,
बस पता है मुझे तो सिर्फ़ ये
हर बात पे आज ज़ंग लड़े जाएँगे

हर दिलो में मंदिर टूटते पल पल
मस्जिदें हैं दम तोड़ती इंसानियत के साथ
फ़िक्र ना किसी एक हिंदू को
ना है कोई मुसलमान इससे परेशन

अपने सिने में एक मंदिर बचाए हुए हूँ,
टूटने के डर से कही अंदर छुपाए हुए हूँ
इंतेज़ार है किसी मुस्लिम के आने का
जो तोड़ चुका अपना मस्जिद, खुदा जिससे नाराज़ है

एक बार जो मेरी इंसानियत भी मर जाए
सो मैं भी पागलों सा सड़क पे उन्माद करू
किसी निरीह का मस्जिद मैं भी बर्बाद करू
भरकायूं दंगे जी जान से हर जगह,

जला दूं हर चीज़ जो दिखे मेरे सामने
इस देश के कुछ तुकरे और कर दूं
कही राम और कही रहीम को मरते देखूं
शायद मेरी आत्मा तब कही शाँत होगी

फिर बिलख कर अपने मारे इंसान टटोलेगी
नही मिलेगा उससे कुछ रक्त सिंचित चितारे के अलावा
मारना चाहे भी तो क्या
वो फिर दुबारा कैसे मरेगी.