आज फिर से भभूत कुरेदे जाएँगे,
पुराने प्रसंग पर लोग मारे जाएँगे,
क्या ग़लत और सही, मैं नही जानता,
बस पता है मुझे तो सिर्फ़ ये
हर बात पे आज ज़ंग लड़े जाएँगे
हर दिलो में मंदिर टूटते पल पल
मस्जिदें हैं दम तोड़ती इंसानियत के साथ
फ़िक्र ना किसी एक हिंदू को
ना है कोई मुसलमान इससे परेशन
अपने सिने में एक मंदिर बचाए हुए हूँ,
टूटने के डर से कही अंदर छुपाए हुए हूँ
इंतेज़ार है किसी मुस्लिम के आने का
जो तोड़ चुका अपना मस्जिद, खुदा जिससे नाराज़ है
एक बार जो मेरी इंसानियत भी मर जाए
सो मैं भी पागलों सा सड़क पे उन्माद करू
किसी निरीह का मस्जिद मैं भी बर्बाद करू
भरकायूं दंगे जी जान से हर जगह,
जला दूं हर चीज़ जो दिखे मेरे सामने
इस देश के कुछ तुकरे और कर दूं
कही राम और कही रहीम को मरते देखूं
शायद मेरी आत्मा तब कही शाँत होगी
फिर बिलख कर अपने मारे इंसान टटोलेगी
नही मिलेगा उससे कुछ रक्त सिंचित चितारे के अलावा
मारना चाहे भी तो क्या
वो फिर दुबारा कैसे मरेगी.
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