29 January, 2011

एक एहसास छोड़ती जाना

मूड कर तुम देखो या ना देखो
बस एक एहसास छोड़ती जाना ज़रूर
कभी जो लौटोगे इधर तक
कुछ बातें करने को होंगी

अजनबी लगो जब मिलोगे कभी
इतनी खामोशी ना छोड़ जाओ
शाम में थॅकी आखें लगेंगी
तो ये और घायल करेंगी मुझे

अधूरी साँसे जो रह गयी अटकी
उन्हे यूँ रहने दो अभी वहीं
फ़ुर्सत में जब भी बैठेंगे
तो उन्हे साथ जी लेंगे कभी

आखों में सुनेपन से लिपटे आँसू
और दिल में दर्द की कुछ गाँठे
मेरे मौला आज तूने इतना दिया
जो कुछ भी मेरे पास खाली नही

मिलोगे फ़ुर्सत में कभी
तो बातें होंगी बाक़ी सारी
अभी एक एहसास छोड़ती जाना
लौटोगे तो मिलूँगा सोचते तुम्हे यही

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