ये नींद खुली ही मेरी क्यों,
जो मैंने सिर्फ़ करवट उलटी,
सूखे गले से आवाज़ ग़ायब
शायद आज फिर सपना देखा है,
अंतर्मन मेरा सहमा होता है
मेरे सोने पे अकेले होने से,
हर रात डरा मुझसे लिपट कर
पिछली रात की बातें बताता है
उसकी बातें किसी सपने सी बेजान,
मेरी ही अधूरी कहानी के पन्ने लगते है
नीरस हो मुझे बेख़बर ज़ो नींद आती है
सुबह मृत सपने बिस्तर पे बिखरे पता हूँ
औरों के होंगे सपने सतरंगी सुहाने
मेरे तो मृत पड़े भी बेरहम दिखते हैं
तशल्ली इस बात होती है मुझे
सुबह होने पे ये खुद टूटे मिलते हैं
सच है सपने हक़ीकत नही होते
1 comment:
Thats Good !
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